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क्रांति की अगुआ?

बदलाव की अलख जगाने वाली महिलाओं और सोवियत लोगों का क्या हुआ?

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

बहुत कम लोग जानते हैं कि रूसी क्रांति की शुरुआत 8 मार्च, 1917 को रूस के पेट्रोग्राद में महिलाओं द्वारा की गई एक हड़ताल से हुई थी। इस साल दो रूसी क्रांति के सौ साल पूरे हो रहे हैं। इनमें एक अक्टूबर में हुई थी। इसे 20वीं सदी का सबसे प्रभावी क्रांति माना गया। वहीं दूसरी क्रांति मजदूरों और सैनिकों की थी। इन सैनिकों को वर्दी वाला किसान भी कहा जाता था। इन्होंने पूंजीवाद का विरोध नहीं किया था। बल्कि इन लोगों ने पूंजीवादी विचारधारा वाली कैडेट पार्टी को प्रांतीय सरकार बनाने की सहमति दी थी। 

पहले विश्व युद्ध के दौरान 1917 की सर्दियों तक आम लोगों के लिए स्थितियां असहनीय हो गई थीं। खाद्य और ईंधन की घनघोर कमी हो गई थी। इससे लोग गरीब की जद में जा रहे थे। 1905 की नाकाम क्रांति की याद में खूनी रविवार पर पेट्रोग्राद में हड़ताल और प्रदर्शन किए जा रहे थे। इसने माहौल को और भड़काया। पश्चिमी जूलियन कैलेंटर के मुताबिक 23 फरवरी से 8 मार्च के बीच पेट्रोग्राद की सड़कों पर उतरकर वस्त्र उद्योग में काम करने वाली महिला श्रमिकों ने ब्रेड की मांग की। इस अभियान ने आगे के अभियानों की रूपरेखा तैयार कर दी। कोई नहीं जानता था कि 8 मार्च आंदोलन की शुरुआत का दिन बन जाएगा। लेकिन महिलाओं ने जिस तरह का साहस और प्रतिबद्धता का उदाहरण पेश किया उससे वाइबोर्ग जिले के बोल्शेविक की अगुवाई वाले वे मजदूर भी इसमें शामिल हो गए हैं जो धातु कंपनियों में काम करते थे।

हो सकता है कि इन महिलाओं को क्रांति को जन्म दिलाने वाली महिलाएं कहना कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लगे लेकिन उनकी पहल ने उसी दिन तकरीबन 90,000 मजदूरों को सड़कों पर खींच लाया और आगे की क्रांति की पटकथा लिख दी। इसके बाद अगले ही दिन ब्रेड की मांग के साथ शुरू हुए अभियान में सड़कों पर तानाशाही और युद्ध के खिलाफ नारे लगने लगे। जब सैनिकों को कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए वहां भेजा गया तो महिलाओं ने बड़े साहस के साथ इनका मुकाबला किया। इन लोगों ने सैनिकों से बंदूकें छोड़कर अभियान में शामिल होने की अपील की। इन सैनिकों में से अधिकांश खेती-किसानी की पृष्ठभूमि वाले थे। इनमें से कई अभियान में शामिल हो गए। 11 मार्च तक विद्रोह शुरू हो गया था। 

यह 12 मार्च को पूरा हो गया। जार ने गद्दी छोड़ दी। जीत के बाद विचारधारा की ताकत बेहद मजबूत थी। ऐसा लग रहा था कि जार के शासन की जगह बुर्जुआ शासन लेने जा रहा है। इसके साथ ही सोवियत श्रमिकों और सैनिकों का परिषद वैकल्पिक सत्ता केंद्र के तौर पर उभरा। लेकिन कैडेट पार्टी की अस्थाई सरकार क्रांति की मांगों को नहीं पूरा कर रही थी।

श्रमिकों और सैनिकों को यह समझने में देर नहीं लगी कि नई सरकार या और भी कोई बुर्जुआ सरकार उनकी मांगों को नहीं मान सकती। उनकी मांगें क्या थीं? वे मांग कर रहे थे कि लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हो, ग्रामीण सामंतों की जमीन जब्त करके किसानों में मुफ्त में बांटी जाए, विश्व युद्ध में रूस औपनिवेशिक रुख छोड़े, शांति बहाल हो और काम के लिए आठ घंटे की समय सीमा तय की जाए। बहुत जल्दी श्रमिकों, किसानों और सैनिकों को यह समझ आ गया कि इन मांगों को पूरा करने के लिए इस सरकार को उखाड़ फेंकना होगा और नई सोवियत सरकार बनानी होगी।

नई सोवियत सरकार अक्टूबर में रूस की सत्ता में आ भी गई लेकिन क्रांति का सूत्रपात करने वाली महिलाएं कहीं गुमनामी में खो गईं। यहां तक की अस्थाई सरकार को हटाने में पुरुष ही आगे दिखे। इसके बाद सोवियत सरकार भी स्वतंत्र तौर पर 1918 के गर्मियों से आगे नहीं काम कर सकी। यह एक अजीब विडंबना है कि इसके बाद क्रांति में अहम भूमिका निभाने वाली न सिर्फ महिलाएं बल्कि श्रमिक वर्ग को भी सोवियत में और कारखानों में पर्याप्त जगह नहीं मिला।

क्या मानवता को निस्वार्थ भाव से इतना कुछ देने वाले आम लोगों की नियती यही है कि उनके योगदान को संभ्रांत लोग इतना जल्दी भूल जाएं? 

Updated On : 13th Nov, 2017
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