ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

आंशिक स्वागत वाला अदालती फैसला

बाबरी मस्जिद मामले में आया अदालती फैसला व्यवस्थागत समस्याओं को नहीं दूर करता है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

उच्चतम न्यायालय ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक अनुकूल कार्य किया है। इसने यह सुनिश्चित कर दिया है कि आयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने का मुद्दा जीवित रहे। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई को 25 साल पुराने मामलों को एक साथ करके इसकी सुनवाई लखनऊ के अदालत में करने का निर्देश दिया। जिन लोगों पर मुकदमा चलाया जाना है उनमें भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती शामिल हैं। इन पर 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए साजिश करने का आरोप है। लेकिन इस फैसले का एक अनचाहा पक्ष यह है कि भाजपा इसका इस्तेमाल अपने सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करेगी ताकि हिंदू वोट बैंक 2019 के आम चुनावों में उसके साथ आ जाए।

इसके अलावा आखिर और कैसे सर्वोच्च अदालत के निर्णय की व्याख्या की जा सकती है? 6 दिसंबर, 1992 को सैंकड़ों की संख्या में कारसेवक अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए और उन्होंने पुलिस, मीडिया और हौसला बढ़ा रहे नेताओं के सामने अपनी योजना के मुताबिक इसे ढहा दिया। जो दो प्राथमिकी दर्ज हुई उनमें एक आडवाणी के खिलाफ थी और दूसरी लाखों अनाम कारसेवकों के खिलाफ। लेकिन मामला वहीं का वहीं बना रहा। इन दो मामलों की स्थिति हमारी न्याय व्यवस्था की सड़न को उजागर करने वाली है। फिर भी कम से कम एक मामले में सर्वोच्च अदालत का निर्णय एक अहम हस्तक्षेप है। अदालत ने यह कहा है कि दो अलग-अलग मामलों को एक साथ मिलाया जाए। इनमें एक की सुनवाई रायबरेली में चल रही थी और दूसरी की लखनऊ में। अब इनकी सुनवाई लखनऊ में होगी। अदालत ने कहा है कि दो साल के अंदर सुनवाई पूरी हो और इस बीच अनावश्यक तरीके से जजों का स्थानांतरण नहीं किया जाए। ऐसा करके अदालत ने न्याय तंत्र में व्याप्त व्यवस्थागत खामियों से इस मामले को बचाने की कोशिश की है।

इसके लिए हम आंशिक तौर पर सराहना कर सकता है। क्योंकि इस निर्णय से आपराधिक न्याय तंत्र में व्याप्त गंभीर समस्याओं का समाधान नहीं होता। हजारों मुकदमे ऐसे हैं जो इस न्याय तंत्र में उलझ कर रह जा रहे हैं। कहीं तारीख पर तारीख मिल रही है तो कहीं न्यायिक अधिकारियों को बार-बार बदलने से परेशानी हो रही है। वहीं सरकारी वकीलों की लापरवाही और गवाहों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होने से गवाहों का मुकरना बेहद आम हो गया है। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होता तब तक सर्वोच्च अदालत का हालिया हस्तक्षेप अपवाद ही माना जाएगा।

यहां इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि सर्वोच्च अदालत का यह आदेश अपने आप में पहला नहीं है। 2004 में बेस्ट बेकरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुजरात से महाराष्ट्र के एक फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का आदेश दिया था। यह मुकदमा 2002 के गुजरात दंगों के वक्त वड़ोदरा में 14 लोगों की हत्या से संबंधित था। उस वक्त अदालत ने यह फैसला गुजरात के माहौल को देखते हुए किया था। क्योंकि राज्य सरकार की मशीनरी न्याय दिला पाने में असमर्थ दिख रही थी। उस वक्त अदालत ने कहा था कि यह उसके अधिकार क्षेत्र में है कि तकनीकी बातों में उलझे बगैर सच तक पहुंचने की वह व्यवस्था करे। ऐसी ही एक तकनीकी पेंच में बाबरी मस्जिद मामला 1997 में फंस गया था। उस वक्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि दोनों मामलों की सुनवाई एक अदालत में कराने के बजाए दो अलग-अलग अदालतो में रायबरेली और लखनऊ में हो।

अदालती निर्णय की वजह से यह मामला एक बार फिर से सामने आ गया है। ऐसे में हम इस बात का मूल्यांकन करने की कोशिश कर सकते हैं कि बाबरी मस्जिद के विध्वंश का बीते 25 साल में भारत के लिए क्या मतलब रहा है। 1990 में आडवाणी की रथ यात्रा शुरू हुई। मुद्दा राम मंदिर था। इसका नतीजा दिसंबर, 1992 में बाबरी विध्वंश के तौर पर सामने आया। इसने भारत को सांप्रदायिक धु्रवीकरण के रास्ते पर धकेल दिया। हिंदुत्व दस्ता का हौसला बढ़ता गया और 2014 में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में स्पष्ट जीत हासिल की। इसी साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे यह बता रहे हैं कि यह स्थिति अभी बदली नहीं है। इस बीच 1992 में मुंबई में दंगे हुए और गुजरात में 2002 में। इन सबसे अल्पसंख्यकों के बीच यह बात घर करती गई कि भारत में उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं हो पाएगा। 2014 के बाद तो यह चीज और तेजी से बढ़ी और अल्पसंख्यक लगातार खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

ऐसा संभव नहीं लग रहा कि अदालत के आदेश के बाद भाजपा नेताओं की नींद उड़ गई होगी। बल्कि इसके उलट सच्चाई तो यह है कि इस अदालती निर्णय का इससे अनुकूल वक्त नहीं हो सकता था। उमा भारती के बयानों से यह स्पष्ट हो जाता है। अगर अदालत आडवाणी और दूसरे नेताओं को दोषी ठहरा भी देती है तो भी उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि ऊपर की अदालतों में इसे चुनौती देने का विकल्प उनके लिए खुला रहेगा। अगर उन्हें बरी कर दिया जाता है तो भाजपा को फायदा ही फायदा है। सच्चाई तो यह है कि सांप्रदायिकता का जिस तरह का माहौल बना हुआ है उसमें किसी भी निर्णय का फायदा चुनावी लाभ के लिए उठाया जा सकता है।

आजादी के बाद भारत ने सांप्रदायिक तनाव की कई स्थितियों को देखा है। लेकिन 6 दिसंबर, 1992 की घटना इन सबमें बिल्कुल अलग थी। क्योंकि इसने हिंदुत्व की ऐसी राजनीति को मजबूती दी जो दिनोंदिन और मजबूत हो रही है। अभी से दो साल बाद लखनऊ की अदालत से आने वाला फैसला इस प्रक्रिया में एक पड़ाव मात्र होगा।

 

 

 

 

 

Updated On : 13th Nov, 2017
Back to Top