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अपनी ताकतों को खुद पहचानना

मुंबई के सफाइकर्मियों की कानूनी जीत यह बात फिर से बताती है कि सामूहिक तौर पर मोलभाव करना कितना उपयोगी है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

10 सालों की कानूनी लड़ाई के बाद सफाइकर्मियों को बृहन्नमुंबई नगर निगम (बीएमसी) में स्थाई नौकरी मिलेगी। पहले यह मामला औद्योगिक ट्राइब्यूनल के पास था। बाद में यह उच्च न्यायालय होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तीनों स्तर पर निर्णय मजदूरों के पक्ष में आए और तीनों स्तर पर बीएमसी की हार हुई। यह जीत मजदूरों के साथ-साथ कच्र वहतुक श्रमिक संघ (केवीएसएस) की भी जीत है। इससे यह भी पता चलता है कि एकजुट होकर काम करने और इस तरह के मामलों में एकजुट होकर मोलभाव करना कितना अहम है। इससे यह भी पता चलता है कि भारत में संकट झेल रहे मजदूर संघ अब भी प्रभावी बने रह सकते हैं अगर वे सही रणनीति के साथ काम करें। लेकिन फिर भी इस कानूनी जीत को मजदूरों के संघर्ष का अंत नहीं माना जाना चाहिए।

कचरा जमा करना और इसे एक निश्चित जगह तक ले जाने की प्रक्रिया में इन मजदूरों को कई तरह के चर्म रोग और सांस लेने से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से अधिकांश लोग ऐसे हैं जो पिछड़ी जातियों से हैं। सीवर की सफाई करने वालों की तरह ये मजदूर भी ऐसा काम करते हैं जो मुंबई या किसी और भी शहर के बने रहने के लिए बेहद अनिवार्य है। लेकिन फिर भी समाज इन्हें जरूरी मान्यता नहीं देता। इनमें से कई लोग शराब पीना शुरू कर देते हैं। क्योंकि इन्हें लगता है कि ऐसा करने से जिन परिस्थितियों में इन्हें काम करना पड़ता है, उसे वे नजरंदाज कर सकते हैं। इसके बावजूद भी इनसे उम्मीद की जाती है कि ये बगैर काम की सुरक्षा के काम करें। इन्हें बीमारी के लिए छुट्टी भी न मिले। अगर काम के दौरान जान चली जाए तो किसी को कोई मुआवजा नहीं मिले और न ही किसी कल्याणकारी योजना का लाभ इन तक पहुंचे। ये सारी सुविधाएं सरकार में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलती हैं। केवीएसएस इस बात के लिए संघर्षरत है कि इन मजदूरों को मान्यता मिले और लोग इनकी स्थितियों को समझें। इसे इस बात में भी सफलता मिली है कि सफाइकर्मियों को न्यूनतम मजदूरी मिलेगी और दूसरी सुविधाएं भी।

कानूनी लड़ाई के दौरान बीएमसी ने अदालत में कहा कि इन मजदूरों को उसने काम पर नहीं रखा है बल्कि ये लोग उसके कामों को ठेका लेने वाले ठेकेदारों के मजदूर हैं। इसे हैदराबाद पैटर्न कहा जाता है। इसके तहत हर वार्ड को अलग-अलग इकाईं में बांट दिया जाता है। इसके बाद साफ-सफाई और कचरा उठाने के लिए गैर सरकारी संगठनों को ठेके दिए जाते हैं। केवीएसएस ने बीएमसी के इस तर्क पर कहा कि ठेकेदारों की कोई स्वतंत्र योग्यता या क्षमता नहीं है, इसलिए मजदूरों को मजदूरी बीएमसी की ओर से ही दी जाती है। उसने पर्यावरण संरक्षण कानून का हवाला देते हुए यह बताया कि साफ-सफाई और कचरा हटाने का काम नगर निगम का है। केवीएसएस ने यह भी दिखाया कि बीएमसी ठेकेदार के हर काम को नियंत्रित करती है। भर्ती वार्ड स्तर पर होती है और निगरानी का काम बीएमसी के स्तर पर किया जाता है।

केवीएसएस के लिए यह लड़ाई एक बड़ी चुनौती का एक हिस्सा मात्र है। असंगठित क्षेत्र में मजदूरों को एकजुट करना श्रमिक संघर्षों का सबसे मुश्किल काम है। नौकरी को लेकर असुरक्षा की वजह से वे मजदूर संगठनों में शामिल होने से डरते हैं। अगर वे शामिल भी होते हैं तो उनकी काम की परिस्थितियां इस तरह की हैं कि वे लंबे समय तक किसी संघर्ष में शमिल रहने को सक्षम नहीं रहते। इस बात का केवीएसएस को श्रेय जाता है कि उसने श्रमिकों की एकता को बनाए रखा। यह संगठन समाज के दूसरे हिस्सों को भी अपने साथ जोड़ने में कामयाबी हासिल की। इनमें छात्र, पत्रकार, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, कानूनी समझ रखने वाले लोग, फिल्मकार आदि शामिल हैं। इस संगठन ने अपने ब्लाॅग और वेबसाइट का भी सही ढंग से इस्तेमाल करके अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की।

केवीएसएस की यह जीत सरकार और नगर निगमों के दोहरे मापदंडों को उजागर करती है। एक तरफ तो ये स्वच्छ भारत अभियान का नारा लगा रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ शहरों को साफ करने वालों के प्रति थोड़ी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा रहे हैं। अपनी वेबसाइट पर केवीएसएस ने सेलिब्रिटी और नेताओं द्वारा झाड़ू मारने को नौटंकी बताते हुए कहा है कि शहरों को तो हम साफ करते हैं लेकिन ये लोग अपनी परछाई को साफ कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि नागरिकों के एक वर्ग के लिए सफाई एक दूसरे वर्ग को गुलाम बनाकर नहीं हासिल की जा सकती। यह एक ऐसा संदेश है जिसे सरकारों और सिविल सोसाइटी को समझना चाहिए।

Updated On : 13th Nov, 2017
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