ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

धरती माता को मौत की सजा

यह सजा सुनाने वाले डोनल्ड ट्रंप हैं और उन्हें जीवाश्म ईंधन के पूंजी पर खड़े लोगों और पर्यावरणविरोधियों का समर्थन मिला हुआ है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

डोनल्ड ट्रंप जलावायु परिवर्तन को हमेशा से धोखा बताते रहे हैं. 2 जनवरी, 2014 को उन्होंने अपने पहले ट्विट में एक प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक पर हमला करते हुए यह लिखा कि ग्लोबल वार्मिंग की यह खर्चीली बकवास बंद होनी चाहिए. ऐसे में जब उन्होंने 1 जून, 2017 को 2015 पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा की तो यह अनापेक्षित नहीं था. पूरी दुनिया में होने वाले हरित गैस उत्सर्जन में अमेरिका की हिस्सेदारी 15 फीसदी है. दिसंबर, 2016 में एक दस्तावेज सामने आया था. यह ट्रंप प्रशासन की पर्यावरण नीतियों के बारे में था. इसे तैयार किया था थाॅमस पाइली ने. वे कोच बंधु समर्थित अमेरिकी ऊर्जा अलायंस के प्रमुख हैं और ट्रंप की टीम में ऊर्जा से जुड़े मामलों को देखते रहे हैं. इस दस्तावेज से पर्यावरण पर ट्रंप की नीतियों का खुलासा होता हैः 1. अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकालना, 2. ओबामा के स्वच्छ ऊर्जा की योजना को बंद करना और 3. कीस्टोन समेत सभी पाइपलाइन परियोजनाओं को पूरा कराना.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रंप और उनके सलाहकार अमेरिका के एक खास वर्ग की नुमाइंदगी करते हैं. यह खास वर्ग जीवाश्म ईंधन के कारोबार से जुड़ा हुआ है. लेकिन ट्रंप का यह निर्णय अमेरिका के सत्ताधारी वर्ग में सभी को अच्छा नहीं लगा है. न ही उनके इस निर्णय को पश्चिमी यूरोप और जापान में सराहा गया है. उनकी ‘अमेरिका फस्र्ट’ की नीति ने इस क्षेत्र में अमेरिका को नेतृत्व को पहले ही कमजोर किया है.

जीवाश्म ईंधन के कारोबार में कोच इंडस्ट्रीज बड़ा नाम है. इसके कोच बंधुओं के अलावा ट्रंप के चुनाव अभियान  में पैसा लगाने वाले कई कारोबारियों ने जलवायु परिवर्तन पर चिंता भी जताई है. गोल्डमैन सैक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लाॅयड ब्लैंकफैन ने ट्रंप के इस निर्णय पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह पर्यावरण के लिए बुरा है और दुनिया में अमेरिका के नेतृत्व के लिए भी यह बुरी खबर है. ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी एक्सनमोबिल ने पेरिस समझौते का समर्थन किया था. इसके पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी और अभी अमेरिका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने जलवायु परिवर्तन के मसले पर अलग राय रखी थी. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी ईपीए के स्काॅट प्रूइट और ट्रंप के प्रमुख रणनीतिकार और ब्रेटबार्ट न्यूज के प्रमुख स्टीफन बैनन की राय को नहीं माना था. ट्रंप प्रशासन में ये दोनों लोग जलवायु परिवर्तन समझौतों के सबसे मुखर विरोधी हैं.

ऐसा लगता है कि इन तीनों क्षेत्रों के सत्ताधारी वर्ग और उनके राजनीतिक नुमाइंदों को यह लगता था कि पूंजीवाद का पर्यावरण के लिहाज से आधुनिकीकरण करना काफी समय से लंबित है. लेकिन पेरिस समझौते के तहत लक्ष्यों को जानबूझकर स्वैच्छिक और गैर बाध्यकारी रखा गया. इन्हें लागू कराने के लिए न तो कोई तंत्र बनाया गया और न ही पालन नहीं करने के लिए किसी तरह के दंड का प्रावधान किया गया. ओबामा प्रशासन ने पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी ईपीए को दी थी और इसे क्लीन एयर एक्ट के तहत बिजली बनाने वाली कंपनियों के कार्बन उत्सर्जन को नियमित करने का काम दिया था. लेकिन इसे रोकने के लिए यह मामला अदालत में ले जाया गया. अब तो ट्रंप प्रशासन ने पेरिस समझौते से ही हटने की घोषणा कर दी है.

जिन तीनों क्षेत्रों को जिक्र पहले किया गया है, वहां का सत्ताधारी वर्ग इस समझौते का इसलिए समर्थन करता है क्योंकि यह स्वैच्छिक और गैर बाध्यकारी है. क्योटो प्रोटोकाॅल के तहत अमेरिका समेत दूसरे विकसित राष्ट्रों पर हरित गृह प्रभाव गैसों के उत्सर्जन को कम करने की बाध्यकारी जिम्मेदारी थी. लेकिन अमेरिका ने इसे मानने से मना कर दिया और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए कुछ खास किया भी नहीं. यह बिल्कुल स्पष्ट बात है कि स्वैच्छिक और गैरबाध्यकारी लक्ष्यों को हासिल करने की संभावना कम रहती है. आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी जिस तरह से हरित गृह प्रभाव गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, अगर यही बरकरार रहा तो तापमान में 2 डिग्री की बढ़ोतरी अगले 20 सालों में ही हो जाएगी. यह बढ़ोतरी एक ऐसा बिंदु है जो यह बताता है कि अब तापमान इतना बढ़ गया है कि अब जो चीजें शुरू होंगी उन्हें रोका नहीं जा सकता. इस आशंका के बावजूद अमीर, अधिक उत्सर्जन करने वाले और ऐतिहासिक तौर पर अभी हरित गृह गैसों के उच्च स्तर के लिए जिम्मेदार देशों के नेता स्वैच्छिक और गैर बाध्यकारी समझौते पर तैयार होने के बावजूद पीछे हट रहे हैं.

दरअसल, दुनिया के पूंजीपतियों ने पूंजी एकत्रित करने की होड़ में जिस तरह से मजदूरों और प्रकृति का शोषणा किया है, वह अब ऐसे स्तर पर पहुंच गया है कि जिसे और झेल पाना प्रकृति के वश में नहीं है. अब प्रकृति जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को झेलने को तैयार नहीं है. इसके बावजूद पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ लेने वाले लोग जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर जाने की प्रक्रिया को बाधित कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि ऐसे लोगों के नुमाइंदे डोनल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से पीछे हटकर धरती माता को मौत की सजा सुना दी है. अगर उनका साथ दे रहे पूंजीपतियों ने उनके इस फरमान का क्रियान्वयन शुरू किया तो मानव सभ्यता एक लंबे और दुखदायी अंत की ओर बढ़ जाएगी.

 

Updated On : 13th Nov, 2017
Back to Top