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क्या प्रतियोगी परीक्षाएं अतार्किक हैं?

भारतीय परीक्षा व्यवस्था सफलता से कहीं ज्यादा असफलताएं निर्मित करती है.

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

किसी भी प्रतिस्पर्धी आकार वाली परीक्षा में सफलता और असफलता की अपनी ख़ास पारस्परिक सच्चाइयां होती हैं. लेकिन सभी परीक्षाएं गहन नहीं होती जब तक कि उन्हें प्रतिस्पर्धा के सांचे में न डाला जाए. सिविल सर्विसमेडिकलमैनेजमेंट और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें सार्वजनिक रूप से बहुत "प्रिय स्थल" समझा जाता है. ये क्षेत्र आकांक्षियों में सपने जगाते हैं. और इन्हीं में परीक्षाएं काफी गहन होती हैं क्योंकि इनसे मिलने वाले फलों की चाह सबसे ज्यादा होती है. इन जगहों पर पहुंचने की जो चाह होती है वो तब से आकांक्षियों को प्रतिस्पर्धा के सिन्ड्रोम में कैद करने लगती हैं जब वे बच्चे होते हैं.

 

चूंकि ये परीक्षाएं इन बेहद विशिष्ट क्षेत्रों में प्रवेश पाने के लिए जरूरी होती हैं इसलिए जाहिर तौर पर ये बड़ी संख्या में आवेदकों को आकृष्ट करती है जो कुछ सौ या हजार सीटों के लिए मुकाबला करते हैं. आमतौर पर परीक्षाएं फिल्टर यानी छननी का काम करती हैं. वो असफलताएं ज्यादा पैदा करती हैं और सफलता कम. जैसे अगर हम संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी)स्नातक रिकॉर्ड परीक्षा (जीआरई)ग्रेजुएट मैनेजमेंट एडमीशन टेस्ट (जीमैट)भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान संयुक्त प्रवेश परीक्षा (आईआईटी जेईई) और राष्ट्रीय योग्यता प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) के अंतर्गत आयोजित होने वाली परीक्षाओं की बात करें तो इनमें लाखों आवेदक हिस्सा लेते हैं और उनमें से सिर्फ कुछ हज़ार आवेदकों को ही चुना जाता है.

 

सवाल ये उठता है कि जब ये परीक्षा व्यवस्था सफलता से ज्यादा असफलता उत्पादित कर रही है तो फिर भी आकांक्षी ऐसी परीक्षाओं में और ज्यादा हिस्सा लेने के लिए क्यों तैयार रहते हैंआखिर ऐसा क्यों है कि सरकार इन असफलताओं और उनके नतीजतन जो घातक परिणाम पैदा होते हैं उनसे परेशान नहीं दिखती?

 

ऐसा तार्किक माना जा सकता है कि ये इन परीक्षाओं की विचारधारा ही होती है जो व्यक्ति की असफलता और निराशा के सामाजिक उपद्रव में तब्दील होने की संभावना को दूर कर देती है. परीक्षाओं का जो विचार होता है वो आकांक्षियों के बीच निराशा से ज्यादा उम्मीद पैदा करता जाता है. दरअसल ये परीक्षाएं उम्मीद और निराशा के बीच के तनाव को संतुलित करने की कोशिश करती हैं. अधिकारवादी करियरवाद की विचारधारा आकांक्षियों के बीच में ये प्रोत्साहन पैदा करती है कि "आज अगर मेरी जीत हुई है तो कल ये जीत तुम्हे मिलेगी." उम्मीद का जो एक तत्व होता है वो निराशा की विध्वंसात्मक ताकत को खत्म करता है. सफल आवेदकों की उपलब्धियों को प्रदर्शित करने के लिए आयोजित होने वाले कार्यक्रम विज्ञापन का काम करते हैं जो अधिकारवादी करियरवाद की विचारधारा को संप्रेषित करते हैं. इससे तार्किकता के तत्व के जरिए निराशा की उस बेपनाह भावना को मद्धम करने की कोशिश होती है जो इन प्रतियोगी परीक्षाओं का अंतर्निहित हिस्सा है. ये परीक्षाएं जितनी पारदर्शी और नियमों से बंधी बताई जाती हैं उतनी ही तार्किक भी होती हैं. परीक्षाओं की जो ये खुलेपन वाली प्रकृति है वो अभ्यर्थियों में भरोसे का एक तत्व रोपना चाहती है, वो अपने अंतिम विश्लेषण में उनकी असफलता को तार्किक बनाने की कोशिश करती है.

 

इसका मतलब ये है कि वो लोग जो हार का सामना करते हैं वे इसका दोष अपने ऊपर डालते हैं और उसके बावजूद फिर बार-बार ऐसी कोशिशें करते हैं जो शायद उनको फिर से असफलता की ओर ले जाएंऔर वहां से आत्महत्या जैसे कठोर फैसलों की तरफ ले जाएं. प्रतियोगी परीक्षाओं की विचारधारा में जो तर्क अंतर्निहित है वो उम्मीद और निराशा के बीच संतुलन हासिल करने को एक जम़ीन मुहैया करवाता है. ऐसे में जो अभ्यर्थी होता है वो अपनी आकांक्षाओं के बजाय इस विचारधारा का ध्वजवाहक हो जाता है.

 

सफलता और असफलता का वैयक्तिकरण सरकार को इस नैतिक जिम्मेदारी से बच निकलने का अवसर दे देता है कि वो अवसरों के अलग-अलग बुनियादी ढांचे बनाकर उनके जरिए अच्छी नौकरियां नहीं उत्पन्न कर रही. सरकार तो इस तथ्य से भी चिंतित नहीं है कि भारतीय युवाओं में निराशा बढ़ती जा रही है और अगर ध्यान नहीं दिया गया तो उनका गुस्सा खतरनाक आकार ले सकता है. सरकार इस बात को लेकर ईमानदार चिंता नहीं प्रदर्शित कर रही कि सम्मानजनक रोजगार के मामले में अवसरों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है. उसे इस बात की एकदम कम परवाह है कि इन आकांक्षाओं का सारा दबाव सिविल सर्विस जैसे एक क्षेत्र पर ही ला देना सरकारी ढांचों के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है. लेकिनइससे भी महत्वपूर्ण ये बात है कि इसी सरकार को प्रतियोगी परीक्षाओं वाले कोचिंग सेंटरों में हो रही वृद्धि को मंजूरी देने में कोई दिक्कत नहीं होती जो देश भर में कुकुरमुतों की तरह फैल रहे हैं. 

 

असफल होने पर, या चरम निराशा में व्यक्ति के जान देने को, व्यक्तिगत नाकामी के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि ये रास्ता आत्म-अवलोकन की तरफ जाएगा जबकि इस रास्ते को उस व्यवस्था से कड़ी पूछताछ की तरफ जाना चाहिए जो अलग-अलग क्षेत्रों में ठीक-ठाक रोजगार देने में असफल रहती है. योग्य अभ्यर्थियों को पर्याप्त रोजगार अवसर देने में ये सरकार लगातार नाकाम रही है. इस संदर्भ में ये कामना की जा सकती है कि इस आकांक्षा को अवसरों के ऐसे दूसरे क्षेत्रों में भी बराबर रूप से फैलाया जाए जो अभी या तो मौजूद ही नहीं हैं या फिर मात्रा में कम हैं. सरकार को कृषि और उद्योग क्षेत्रों में रोजगार की गरिमा और तत्व फिर से स्थापित करना ही होगा. जब तक रोजगार के इस बुनियादी दायरे की अनुपलब्धता रहेगी तब तक यूपीएससी कुछेक के लिए पसंदीदा जगह बना रहेगा और बहुत सारों के लिए निराशा की वजह. उपभोक्तावादी पूंजीवाद में व्यापक अवसरों का निर्माण करने की क्षमता नहीं नजर आतीहालांकि नौकरियों के रूप में ये विकल्प पैदा नहीं कर पाता जो अधिकतर आकांक्षी स्वीकार करने से दूरी बनाते हैं क्योंकि ऐसा करके उन्हें लगेगा कि उन्होंने अपनी नैतिक कीमत से समझौता कर लिया है. इन "अपमानजनक विकल्पों" से भागने की जरूरत यूपीएससी जैसे ज्यादा "सुरक्षित" अवसरों पर ज्यादा दबाव ले आती है. इस मायने में प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था एक ऐसी विचारधारा के तौर पर ज्यादा काम करती है जो निरंतर असफलता को तार्किक बनाने की कोशिश करती है और ये तार्किकरण कुछेक लोगों की सफलता की खुशियां मनाकर हासिल किया जाता है.

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