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जलवायु परिवर्तन और गरीब

अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो दशकों में हुए विकास को जलवायु परिवर्तन पलट देगा
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

जलवायु परिवर्तन एक ऐसी आपदा है जिससे पृथ्वी और इस पर रहने वाले लोग, जीव-जंतु, पौधे आदि प्रभावित हो रहे हैं. इसका गरीब लोगों पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है. विकासशील देशों पर भी सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.
पहले लोग यह मान रहे थे कि जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे हो रहा है. अक्टूबर, 2018 में आईपीसीसी की रिपोर्ट आई. इसमें बताया गया कि तापमान में 1.5 डिग्री की बढ़ोतरी होगी. इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस बढ़ोतरी की वजह से भी करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे.
 
अब यह बात तथ्यों के साथ साबित हो रही है कि कैसे जलवायु परिवर्तन की वजह से गरीबों पर बुरा असर पड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन की वजह से लोगों में संसाधनों के लिए संघर्ष बढ़ गया है. 2015 में केपटाउन में पानी का संकट शुरू हुआ था. अब भी इस शहर पर यह खतरा मंडरा रहा है कि यह दुनिया का पहला बड़ा शहर होने जा रहा है जिसके पास पानी नहीं है. यहां भी सबसे बुरे तौर पर गरीब लोग ही प्रभावित हुए हैं. कांगो में भी बरसात के पैटर्न में जो बदलाव हुआ है, उससे खाद्यान्न उत्पादन में कमी आई है और खेती योग्य जमीन के लिए संघर्ष बढ़ गया है. इस तरह के संघर्षों से सबसे नकारात्मक असर गरीबों पर पड़ता है.
 
अक्सर आने वाली बाढ़ और सूखे से अनाज की उपलब्धता में कमी आती है और अनाजों की कीमतों में बढ़ोतरी होती है. इससे भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ती जा रही है. वल्र्ड फूड प्रोग्राम ने 2018 की जो रिपोर्ट जारी की है उसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से आने वाली आपदाओं की वजह से 23 देशों में खाद्यान्न संकट पैदा हुआ. इनमें से अधिकांश देश अफ्रीका में हैं. 3.9 करोड़ लोगों को तत्काल मदद की जरूरत पड़ी.
 
आंतरिक विस्थापन पर 2018 में जो वैश्विक रिपोर्ट आई है, उसमें बताया गया है कि 2017 में संघर्ष और आपदाओं की वजह से 3.06 करोड़ लोगों को इस तरह के विस्थापन का शिकार होना पड़ा. ये विस्थापन 143 देशों में हुए. इसका मतलब यह हुआ कि 80,000 लोगों का विस्थापन रोज हो रहा था. इस रिपोर्ट में बाढ़ और सूखे को ऐसे विस्थापन का प्रमुख वजह बताया गया. बाढ़ की वजह से 86 लाख लोगों का और सूखे की वजह से 75 लाख लोगों का विस्थापन हुआ. ऐसे शरणार्थी दुनिया में हर जगह देखे जा सकते हैं. वह चाहे बांगलादेश हो या पश्चिम अफ्रीका हो. यूरोपीय संघ में इस वजह से शरण मांगने वालों की संख्या में 2100 तक 28 फीसदी बढ़ोतरी होने की संभावना है.
 
जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले नुकसानों में भारत का पांचवां स्थान है. 80 करोड़ लोग यहां गांवों में रहते हैं और जीवन यापन के लिए कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित हैं. 50 प्रतिशत जमीन बारिश पर निर्भर है. तथ्यों के जरिए यह पता चल रहा है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से गेहूं की उत्पादकता में कमी आई है. अध्ययनों से यह भी पता चला है कि छोटे किसान इसके असर से वाकिफ हैं. छोटे किसानों को संस्थागत कर्ज भी नहीं मिल पाता. इससे उन पर जलवायु परिवर्तन का असर और बढ़ जाता है. जलवायु परिवर्तन से गरीबी, कुपोषण और किसानों की आत्महत्या की समस्या और बढ़ती जा रही है.
 
काटोविस जलवायु सम्मेलन 2018 में भारत ने विकसित देशों से यह कहा कि वे आर्थिक मददे के अपने वादों को पूरा करें. गरीब और विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन पर सबसे बुरा असर पड़ रहा है. विकास की दौड़ में भी ये देश पीछे छूट रहे हैं. अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो दशकों में जो विकास वैश्विक स्तर पर और भारत में हुआ है, वह पलट न जाए.
 
खतरे की घंटी पिछले कुछ समय से बज रही थी. अब विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है. साथ ही गरीबों और अमीरों का अंतर भी बढ़ता जा रहा है. इस खाई को बढ़ाने में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को अब कोई खारिज नहीं कर पा रहा है.
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